कविता और जीवन : एक कहानी (कहानी) : अज्ञेय
यहाँ अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) की प्रसिद्ध व्यंग्य-प्रधान एवं मनोवैज्ञानिक कहानी 'कहानी से अधिक कुछ' (कलकत्ता, नवंबर 1937) का सुगठित, धाराप्रवाह, शुद्ध वर्तनी और सशक्त शैली में पुनर्लेखन प्रस्तुत है:
कहानी से अधिक कुछ
१. भूमिका : गाली से पहले थोड़ी प्रतीक्षा
मैं आपको सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि कहानी से कहीं बढ़कर कुछ सुनाने जा रहा हूँ। ज़रा कान लगाकर नहीं, कान से अधिक मन लगाकर सुनिए। पढ़ते-पढ़ते जो गाली आपके होंठों पर मचलने लगे—और यह तो तय है कि आप गाली देंगे ही—उसे कृपा करके अंत तक रोक रखिए। कहते हैं, 'सब्र का फल मीठा होता है'। क्या पता आपके सब्र के बदले मुझे मिलने वाली वह गाली भी ज़रा मीठी हो जाए! इस पर कलम घिसने का कोई पारिश्रमिक तो मुझे मिलने से रहा, इसलिए गाली के प्रति मेरी इस फ़िक्रमंदी को आप क्षमा कर देंगे।
और जब बात 'कहानी से अधिक कुछ' की हो, तो भला कथानक और प्लॉट के झंझट में क्यों पड़ना? वे तुच्छ नियम तो पारंपरिक कहानियों के लिए होते हैं। यहाँ तो जो सीधे सामने आ जाए, वही प्रसंग है।
तो लीजिए, सुनिए हरिद्वार की यह दास्तान—
२. कविता की खोज में हरिद्वार
शिवसुन्दर को अचानक यह इल्हाम हुआ था कि कलकत्ते की तंग गलियों की खाक छानते हुए कविता रचने का प्रयास ही व्यर्थ है। वहाँ चारों ओर केवल बंगाली क्लर्क, सिख ड्राइवर, एंग्लो-इंडियन, लफंगे, बिहारी सिपाही और हर मोड़ पर खड़े भिखारी हैं—केवल हाड़-मांस के आदमी! भला आदमी भी कोई कविता का विषय हो सकता है? इंसान और कविता—हूँह!
कविता के लिए तो प्रकृति चाहिए—कलकल बहती नदियाँ, पलाश के दहकते वन, मलय पवन, और दूर कहीं किसी रहस्यमयी अभिसारिका के नूपुरों की मद्धिम झंकार...
बस, इसी धुन में वह अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर हरिद्वार चला आया। गुरुकुल की ओर, नहर किनारे एक एकांत मकान का आखिरी कमरा उसने ले लिया और वहीं बैठकर कविता के दिव्य अवतरण की प्रतीक्षा करने लगा।
३. आधी रात और नूपुरों की झंकार
दिन भर अरहर के खेतों में भटकना, शाम को पहाड़ी मंदिर की ओट में सूरज का छिपना और गंगा की ठंडी हवा संग उड़ती रेत का चेहरे से टकराना—यह सब उसे अच्छा तो लगा, किंतु जिस 'काव्य-उन्मेष' की उसने आशा की थी, वह नहीं हुआ।
चारपाई पर लेटे-लेटे वह अतृप्ति और सूनेपन से जूझता रहा। आधी रात को सहसा उसकी नींद खुली। सन्नाटे में एक ध्वनि गूँज रही थी—कमरे की खिड़की के पार किसी के नूपुरों की रुनझुन! कोई अज्ञात स्त्री कभी रुककर, तो कभी तेज़ कदमों से चल रही थी।
शिवसुन्दर उठ बैठा। हृदय धड़कने लगा—इस बीहड़ में इतनी रात कौन? क्या कोई अभिसारिका?
वह दिन भर के प्रसंग याद करने लगा—
क्या वह पान वाली तमोलिन थी, जिसने पैसे लेते वक्त एक व्यर्थ की मुस्कान उछाल दी थी?
या हलवाई की वह शर्मीली लड़की?
या फिर वह भिखारन, जिसने पैसे माँगते हुए उसकी ठोड़ी छू ली थी?
तभी खिड़की के ठीक नीचे पायल फिर खनक उठी—खनन्-खनन्!
४. सन का बीज और भ्रम का टूटना
उत्कंठा और वासना के वशीभूत होकर शिवसुन्दर ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल आया। आवाज़ अरहर के खेतों की ओर खिंचती जा रही थी। वह पागलों की तरह खेत की मेड़ों पर दौड़ा।
"कौन हो तुम? कहाँ हो?" उसने पुकारा।
कोई उत्तर नहीं मिला। हवा का एक झोंका आया और फिर वही ध्वनि बजी। भोर की पहली लाल किरण फूटने को थी। शिवसुन्दर हताश होकर मेड़ पर बैठ गया। तभी उसके हाथ के ठीक पास फिर वही आवाज़ आई—खनन्!
उसने चौंककर देखा। वहाँ कोई स्त्री नहीं थी; केवल सन (पटसन) का एक सूखा हुआ पौधा खड़ा था, जिसकी पकी फलियों में बंद बीज हवा के झोंकों से हिलकर खनक रहे थे।
क्षण भर को शिवसुन्दर अवाक रह गया। फिर तीव्र निराशा और क्रोध में उसने पौधे को जड़ से उखाड़ फेंका। उखड़ते हुए भी फलियों ने वही उपहास उड़ाया—खनन्!
उसे बचपन का वह लोकगीत याद आया—‘तेरी पैंजणिया न्यू बाजे ज्यूं बाजे बीज सणी दा।’
वह समझ गया कि जहाँ जीवन की धड़कन नहीं, वहाँ एकांत प्रकृति भी केवल सन के खोखले बीज की तरह बजती है। वह केवल कविता नहीं चाहता था; वह तो जीवन का मांसल रस चाहता था।
५. हर की पौड़ी : दर्शक बनाम जीवन
उसने गुरुकुल का किनारा छोड़ा और हर की पौड़ी के निकट एक कमरा ले लिया, जहाँ से घाट की सीढ़ियाँ, गंगा का प्रवाह और आती-जाती भीड़ स्पष्ट दिखती थी।
वह झरोखे में बैठ गया। उसने सोचा—यही सच्चा जीवन है! मैं ऊपर बैठकर केवल एक निर्लिप्त 'दर्शक' बनकर इस रस को खींचूँगा। जो भीड़ में पिसता है, वह तो तिल की तरह पेर दिया जाता है; पर जो ऊपर से देखता है, वही सच्चा कलाकार है।
घाट की सीढ़ियाँ चढ़ती हुई स्त्रियों के जोड़े गुज़रने लगे:
दो स्त्रियों ने ऊपर देखा और मंद मुस्कराईं—शिवसुन्दर को लगा, यही प्रेम का सच्चा संकेत है।
अगले जोड़े में से एक ने तिरछी नज़र डाली, तो दूसरी ने सशंक दृष्टि से देखकर कदम तेज़ कर लिए—शिवसुन्दर ने सोचा, बाधा और द्वंद्व ही तो कला को जन्म देते हैं।
तीसरे जोड़े ने उसे घूरते हुए क्रोध और तिरस्कार से देखा—उसने इसमें भी आकर्षण का संघर्ष ढूँढ निकाला।
किंतु, जैसे-जैसे दोपहर चढ़ी, औरतों के बड़े-बड़े जत्थे और स्नानार्थियों के हुजूम नीचे से गुज़रने लगे। वे अपने ही वार्तालाप और दुनिया में मग्न थे। किसी ने एक बार भी ऊपर आँख उठाकर नहीं देखा। किसी के लिए झरोखे में खड़े शिवसुन्दर का कोई अस्तित्व ही नहीं था।
शिवसुन्दर भीतर तक छटपटा उठा—
“नहीं, नहीं! यह असत्य है, यह अशिव है, असुंदर है! यह जीवन नहीं हो सकता!”
भीड़ का यह महाप्रवाह उसे किनारे पर सड़ते हुए किसी उपेक्षित तिनके या सीप के भीतर सड़ते कीड़े की भाँति अनदेखा कर आगे बढ़ गया था। वह जीवन के लिए केवल एक अवांछित जूठन बनकर रह गया था।
६. उपसंहार : एक छदाम की याचना
अब आप अपनी वह रोकी हुई गाली दे सकते हैं। कहानी यहीं समाप्त होती है।
परंतु 'कहानी से अधिक कुछ' जो मुझे कहना था, वह यह है—यदि आपको इस रचना में 'छोटे मुँह बड़ी बात' दिखाई दी हो, तो इस अकिंचन को भी एक अभागा हिंदी-लेखक मानकर क्षमा कर दीजिएगा।
मैं भी कोई आकाश के तारे तोड़ने या कर्म का कड़वा रस पीने वाला महामानव नहीं हूँ। मैं भी तो अंत में 'मधुरेण समापयेत्' (मधुर अंत) की लालसा पाले, उसी मँगते की तरह दीन स्वर बनाकर, अपने सुधी पाठकों से केवल उनकी कृपा और दाद की एक 'छदाम' माँग रहा हूँ!
(कलकत्ता, नवम्बर १९३७)