अंगोरा के पथ पर (कहानी) : अज्ञेय

यहाँ अज्ञेय की इस ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक कहानी 'अंगोरा का पथ' (मुलतान जेल, 1933) का सुगठित, धाराप्रवाह, शुद्ध वर्तनी और सशक्त भाव-प्रवण शैली में पुनर्लेखन प्रस्तुत है:

अंगोरा का पथ

१. स्मर्ना की आग और डायरी का संकल्प

“हज़ारों मील दूर के घरों से एकत्र हुए लाखों प्राणियों के सूखे कंठों से एक ही प्यासी, हाहाकारी पुकार उठ रही है—‘शांति! शांति!’ किंतु युद्ध अपनी निर्दयी गति से बढ़ रहा है, शांति कहीं नहीं मिलती।

और यहाँ स्मर्ना नगर के लाखों बेबस तड़प-तड़प कर चिल्ला रहे हैं—‘आग! आग!’ पर नगर जलता जा रहा है, लपटें बुझाने वाला कोई नहीं…”

स्मर्ना के बंदरगाह के समीप एक छोटे से मकान में बैठा एक युवक मेज़ पर झुका हुआ लिख रहा था। जलते हुए नगर का दमघोंटू धुआँ और झुलसाने वाली गर्मी कमरे तक पहुँच रही थी, किंतु वह युवक असीम एकाग्रता से अपनी डायरी में शब्द उकेरने में मग्न था:

*“हम ग्रीक हैं, विजेता हैं, यूरोपीय सभ्यता के जन्मदाता हैं… पर मानवता के गुरु होकर भी आज हम पशु बन चुके हैं! संसार में शांति की स्थापना का दावा करने वाले हम लोग आज भी सिकंदर की क्रूर महत्वाकांक्षाओं को पूज रहे हैं और साम्राज्यवादी तृष्णा की वेदी पर असंख्य निर्दोषों की बलि चढ़ा रहे हैं…

आज जब तुर्क सेना ने हमारे मर्म पर प्रहार कर स्मर्ना को फूँक दिया है, तब हम इसे ‘कायरता’ और ‘विश्वासघात’ कह रहे हैं! पर हमने क्या किया था? जब हमारे राजा कॉन्स्टेंटाइन अंगोरा पर अधिकार करने निकले थे, तब अप्रैल से अगस्त तक हमारी सेना ने थ्रेस से लेकर सकरिया नदी तक तुर्कों के कितने ही घर जलाकर राख कर दिए थे।

मैं भी तो उसी साम्राज्यवादी विजयोन्माद में भर्ती हुआ था। अपने खेत और घर-बार को छोड़कर, आरोरा को साथ लेकर अहंकार में चला था। पर सकरिया नदी की पराजय ने वह मिथ्या दंभ चकनाचूर कर दिया। कॉन्स्टेंटाइन भाग निकला, हमारी सेना बिखर गई और मेरी आँखें खुल गईं।”*

युवक रुका। छत की ओर देखते हुए उसके चेहरे की व्यथा धीरे-धीरे एक कठोर और अडिग संकल्प में बदल गई। उसने सिर झटका और पुनः कलम चला दी:

“कार्ल ने मुझे सत्य का आईना दिखाया और मेरा मिथ्या गर्व ग्लानि में बदल गया।

मैं जानता हूँ कि शायद शाम तक यह घर, यह डायरी और मैं स्वयं भी इस महाअग्नि में भस्म हो जाएँगे। किंतु यदि मैं जीवित बचा, तो यही संकल्प मेरे जीवन का ध्येय होगा:

‘मैं, एंटनी स्टेरास (आयु १७ वर्ष), आज १४ सितंबर १९२२ को यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि भविष्य में कभी किसी साम्राज्यवादी मंसूबे के लिए शस्त्र नहीं उठाऊँगा। मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य साम्राज्यवाद के विरुद्ध निरंतर संघर्ष कर समतामूलक लोकतंत्र की स्थापना करना होगा।’”

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और एक पुरुष तथा एक युवती भीतर आए। एंटनी ने झटपट डायरी बंद कर दी।

“आरोरा, तुम आ गईं!”

आरोरा दौड़कर एंटनी के सीने से लग गई, “टोनी! मुझे विश्वास नहीं था कि हम फिर मिल पाएँगे!”

एंटनी ने उसे संभाला और तीसरे व्यक्ति की ओर देखा, “कार्ल, अब आगे क्या करना है?”

कार्ल ने गंभीर स्वर में कहा, “टोनी, सेना स्मर्ना छोड़ चुकी है और हमारे साथी कियोस व मिटिलीनी द्वीपों पर पहुँचकर संगठन का काम कर रहे हैं। वहाँ बंदरगाह पर मेरे कुछ विश्वस्त संपर्क हैं जो हमें एथेंस पहुँचाने के लिए गुप्त रूप से जहाज़ का प्रबंध कर सकते हैं। पर उन तक संदेश पहुँचाना होगा… कोई जा सके तभी बात बने।”

आरोरा ने एंटनी की मेज़ से डायरी उठाते हुए कहा, “टोनी, दिखाओ तुम क्या लिख रहे थे?”

एंटनी के रोकने पर भी आरोरा ने पन्ने पलटने शुरू किए। उसमें युद्ध का दारुण यथार्थ अंकित था:

‘१८ जुलाई: हम दिग्विजयी हैं… सारा संसार जीत लेंगे!’

‘२९ जुलाई: अंगोरा साठ मील दूर है। कार्ल कहता है कि सिकंदर पागल था और दूसरों को परतंत्र बनाना सबसे बड़ा पाप है। मैं अब कार्ल के विचारों से सहमत होने लगा हूँ…’

‘३० अगस्त: भारी पराजय! लगातार भागना, भूख, प्यास, कीचड़ और रक्त। कार्ल, जिसे हम देशद्रोही कहते थे, आज निहत्था होकर घायलों को पानी पिला रहा है और लाशों के बीच से जीवन बचा रहा है…’

‘२ सितंबर: अनातोलिया से पंद्रह हज़ार शरणार्थियों का रेला स्मर्ना की ओर उमड़ रहा है। शैतान के चार दूत—कलह, अकाल, हिंसा और मृत्यु—यहाँ नग्न तांडव कर रहे हैं। जो गिरता है, भीड़ उसे कुचलती हुई आगे बढ़ जाती है…’

आरोरा की आँखें डबडबा गईं। उसने पूछा, “टोनी, क्या सोच रहे हो?”

एंटनी सहसा उठ खड़ा हुआ, “आरोरा, चलो छत पर चलें!”

२. बंदरगाह पर प्रलय का दृश्य

बंदरगाह पर हाहाकार मचा था। भयभीत घोड़े भीड़ को रौंद रहे थे। माताएँ अपने खोए बच्चों के लिए बिलख रही थीं, पर उनकी चीखें ‘आग! आग!’ के सामूहिक क्रंदन में दबकर रह जाती थीं। जलते हुए शरीरों की दुर्गंध हवा में तैर रही थी।

भीड़ के एक कोने में एक असहाय तुर्क किशोर को ग्रीक लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला और उसके क्षत-विक्षत अंगों को हवा में उछालने लगे। दूसरी ओर, एक अट्टालिका पर लोग जुआ खेल रहे थे और नग्न देह वाली स्त्रियाँ पसीना पोंछती हुई इस भयावह तमाशे को देख रही थीं।

जब लपटों का ताप असहनीय हो जाता, तो पीछे से आने वाली भीड़ के धक्के से आगे खड़े लोग समुद्र में गिरकर डूब जाते।

इसी महाप्रलय के बीच कार्ल पागलों की तरह घाट के सिरे पर पहुँचा और अपनी टोपी हिलाकर दूर खड़े एक अमेरिकी व्यापारिक जहाज़ को संकेत देने लगा। जहाज़ से एक छोटी नाव पानी में उतरी।

तभी भीड़ में एक नई घोषणा गूँज उठी:

तुर्क सेनापति का आदेश था कि १७ से ४५ वर्ष की आयु के सभी पुरुषों को छोड़कर बाकी सभी (महिलाएँ, बच्चे व वृद्ध) नगर छोड़ सकते हैं। शेष पुरुष युद्धबंदी माने जाएँगे।

कार्ल के कदम ठिठक गए। वह भारी मन से वापस लौटा।

३. उत्सर्ग का प्रस्ताव

छत पर खड़े एंटनी के चेहरे पर एक विचित्र, अलौकिक भाव था। नीचे आग की लपटें तांडव कर रही थीं।

उसने अचानक पूछा, “आरोरा, क्या तुम कार्ल से विवाह करोगी?”

आरोरा सन्न रह गई। उसकी आवाज़ काँप उठी, “टोनी! यह क्या कह रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

एंटनी ने शांत भाव से कहा, “अगर ग्रीस की क्रांति के लिए यह आवश्यक हो, तो क्या करोगी? मैंने इस आग में अपना भविष्य देख लिया है, आरोरा। हमारा विवाह नहीं होगा। तुम मेरी नहीं, क्रांति की हो।”

तभी नीचे से कार्ल की पुकार आई। दोनों नीचे उतरे।

कार्ल ने बताया, “तुर्क हुक्मनामे के अनुसार १७ वर्ष से कम उम्र के लोग और महिलाएँ बाहर जा सकते हैं। टोनी, तुम्हारे सैन्य पासपोर्ट में तुम्हारी उम्र १७ वर्ष है, तुम और आरोरा उस अमेरिकी नाव से मिटिलीनी निकल जाओ।”

एंटनी की आँखें चमक उठीं, “नहीं कार्ल! वह पासपोर्ट तुम ले जाओ। तुम मिटिलीनी पहुँचकर क्रांति का नेतृत्व करो। ग्रीस को तुम्हारी आवश्यकता है।”

कार्ल बिफर पड़ा, “पागल हो गए हो? तुम्हारा और आरोरा का अधिकार छीनकर मैं अपनी जान बचाऊँ?”

एंटनी ने दृढ़ता से कहा, “कार्ल, यह भावुकता का समय नहीं है। यदि एक राजा के झूठे दंभ के लिए लाखों लोग मर सकते हैं, तो क्या क्रांति और जन-कल्याण के लिए एक व्यक्ति स्वेच्छा से प्राण नहीं दे सकता? पासपोर्ट पर फ़ोटो को थोड़ा धुएँ से धुंधला कर लेना। तुम और आरोरा कल सुबह निकलोगे!”

आरोरा ने आहत होकर तीखे स्वर में कहा, “हाँ कार्ल, ठीक है… आरोरा तो जा ही सकती है!”

४. मौन आघात

रात के सन्नाटे में कार्ल यात्रा की तैयारी करने बाहर चला गया। कमरे में एंटनी और आरोरा अकेले थे।

एंटनी ने कहा, “आरोरा, नाराज़ मत हो। यह समय ग्रीस के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का है। क्रांति सफल होते ही मैं भी लौट आऊँगा।”

आरोरा ने अश्रुपूर्ण स्वर में केवल इतना कहा, “मुझे सोचने दो, टोनी… जाओ!”

एंटनी छत पर चला गया। उसके जाते ही आरोरा हिस्टीरिया के दौरे की तरह पागलों की नाईं हँसने लगी—वह हँसी भीतर की असीम पीड़ा का विस्फोट थी। बाहर चबूतरे पर लेटे कार्ल ने वह आवाज़ सुनी और सिहर उठा।

५. चरम निर्णय

देर रात जब सब शांत था, आरोरा अचानक चौंककर उठी। उसने कार्ल को बाहर भेजकर एंटनी से दो टूक पूछा:

“टोनी, तुम सचमुच मुझे भेजना चाहते हो?”

“हाँ आरोरा, इसी में सबकी भलाई है।”

आरोरा ने पासपोर्ट हाथ में लिया, जिस पर लिखा था—‘एंटनी स्टेरास एवं उसकी मंगेतर आरोरा’।

उसने काँपते किंतु स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं एंटनी की मंगेतर हूँ। यदि मैं कार्ल के साथ जाऊँगी, तो केवल एक पत्नी के रूप में जा सकती हूँ, किसी धोखे की तरह नहीं। इसलिए मैं कल कार्ल से विवाह करूँगी।”

एंटनी जड़वत रह गया। एकाएक उसके मन में स्मर्ना के वे तीन लाख जलते हुए नर-कंकाल और क्रांति का आह्वान गूँज उठे। उसने अपने व्यक्तिगत प्रेम की बलि चढ़ाने का अंतिम निश्चय किया।

उसने सिर उठाकर कठोर स्वर में कहा, “ठीक है, यही होगा!” और लंबे डग भरता हुआ पुनः छत पर चला गया।

पीछे आरोरा ज़मीन पर ढहकर फूट-फूट कर रो पड़ी।

६. विदाई

अगली सुबह, भीड़ में फँसे एक वृद्ध पादरी ने कार्ल और आरोरा का विवाह संपन्न करा दिया।

एंटनी विवाह में नहीं गया, न ही वह विदा करने बंदरगाह आया। चलते समय जब एंटनी ने दूर से पूछा, “आरोरा, ऐसे ही चली जाओगी?” तब आरोरा ने बिना पीछे मुड़े पथराई आवाज़ में कहा था, “ऐसे ही नहीं… क्रांति की रक्षा करने जा रही हूँ!”

बंदरगाह पर अमेरिकी डोंगियों की कतार में कार्ल और आरोरा जाकर खड़े हो गए।

७. सुनहली लट

छत पर खड़ा एंटनी आग के ताप को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था। उसके हाथ में आरोरा का छोड़ा हुआ एक पत्र और उसके सुनहरे बालों की एक लट थी।

पत्र में लिखा था:

“तुमने मेरा तिरस्कार किया, इसलिए मैं जा रही हूँ ताकि यह विरह सह्य हो सके। आँसू बाद में बहेंगे, जब क्रांति पूरी होगी। यह लट अपने पास रख लेना… मैं अब क्रांति की हूँ।”

एंटनी ने उस सुनहली लट को चूमा, जेब में रखा और डायरी में अंतिम पंक्तियाँ लिखीं:

‘मैंने अपनी सीमा से परे जाकर त्याग किया है, क्योंकि बिना सामर्थ्य से परे जाए क्रांति संभव नहीं। मेरा व्यक्तिगत जीवन अब समाप्त हुआ…’

८. अंगोरा का महापथ

समय बीत गया। स्मर्ना जलकर राख हो चुका था।

मिटिलीनी से उठी क्रांति की ज्वाला ने पूरे ग्रीस को बदल दिया था; कॉन्स्टेंटाइन देश छोड़कर भाग चुका था और नई सरकार की स्थापना हो चुकी थी।

तुर्क सैनिकों की बेड़ियों में जकड़ा, धूल और कालिख से सना एंटनी युद्धबंदी के रूप में स्मर्ना के बंदरगाह पर लगे एक सूचना-पट्ट के सामने खड़ा था। वह अंगोरा की सड़क पर दिन-रात पत्थर ढोने वाला एक बेनाम कैदी बन चुका था।

उसने क्रांति में वीरगति प्राप्त हुतात्माओं की सूची देखी। एक नाम पर उसकी नज़र ठहर गई:

‘एंटनी स्टेरास — मिटिलीनी विद्रोह के समय विमान दुर्घटना में वीरगति, २ अक्टूबर।’

एंटनी के होंठों से धीरे से निकला, “कार्ल…” (कार्ल ने एंटनी के नाम का पासपोर्ट उपयोग किया था)।

सूची में थोड़ा नीचे 'अज्ञात मृतकों' के विवरण में लिखा था:

‘सलोनिका बंदरगाह पर मिली एक १७ वर्षीय अज्ञात युवती का शव, जिसके पास एंटनी स्टेरास के नाम का पासपोर्ट था। शरीर पर गोलियों के आठ घाव—राजशाही के गुप्त षड्यंत्रकारियों द्वारा हत्या।’

एंटनी स्तब्ध रह गया। न कोई चीख निकली, न आँख से आँसू गिरा।

वह धीरे-धीरे समुद्र के किनारे पहुँचा। उसने जेब से अपनी डायरी निकाली, संकल्प वाला पन्ना खोला और बुदबुदाया, “एंटनी स्टेरास तो कब का मर चुका!” और उसने वह डायरी समुद्र की लहरों में फेंक दी।

फिर उसने लिफ़ाफ़े से आरोरा के बालों की वह सुनहली लट निकाली। उगते सूरज की लालिमा में एक-एक बाल को अलग कर वह हवा में उड़ाता गया…

जब अंतिम बाल भी उड़ गया, तब उसने शून्य आकाश की ओर देखकर कहा:

“मेरी आरोरा चली गई… अब वह केवल क्रांति की है।”

दूर आकाश से विमान पर्चे गिरा रहे थे कि युद्ध समाप्त हो गया है और राजबंदी मुक्त किए जा रहे हैं।

किंतु एंटनी ने मुड़कर स्मर्ना के खंडहरों को देखा, बेड़ियों को झनझनाया और सिर ऊँचा कर अकेले ही उस धूल भरे पथ पर चल पड़ा—तुर्की की राजधानी अंगोरा के पथ पर, जहाँ अब उसके लिए केवल मृत्यु का शांत आलिंगन शेष था।

(मुलतान जेल, मई १९३३)